क्या दादा दादी के साथ रहने से बच्चे “बिगड़ते” हैं?

मेरी परवरिश एकल परिवार में हुई है शायद इसीलिए मैं हमेशा अपने दोस्तों / स्कूली साथियों को अपने दादा-दादी के साथ देखकर अचंभित रहती थी।  मैं अपने दादा-दादी  के उस बिना शर्त प्यार और  स्नेह के लिए तरसती थी।  मैंने यह भी देखा कि वे कभी भी किसी भी चीज के लिए ना नहीं कहते थे जो उनके पोते या पोतियां  मांगते थे, हमेशा उनकी मांगों को पूरा करते बिना यह सोचे कि वे सही हैं या गलत और बच्चे भी कभी भी अपने दादा-दादी का साथ नहीं छोड़ना चाहते थे।  यह सब उस समय मुझे बहुत लुभाता था और मै अपने दादा-दादी के साथ न रहने से बहुत खुश नही थी।

 खैर वो मेरा बचपन था, अब मैं आपको वर्तमान समय में ले चलती हूँ।  मेरा एक बेटा है जो मेरे प्यारे माता-पिता और ससुराल वालों से घिरा हुआ है।  और वह आशीर्वाद और निस्वार्थ  प्रेम जो मुझे नहीं मिला मेरा बेटा उस प्रेम से सराबोर है।  उसके पास अपने दादा दादी और नाना-नानी दोनों हैं जो अपने प्यार के साथ-साथ कई अन्य भौतिकवादी चीजो से भी मेरे बच्चे को बिगाड़ना पसंद करते हैं।  अब कौन नहीं चाहता कि उनके बच्चे को ज्यादा से ज्यादा लोग प्यार करें लेकिन जब मैंने “बिगाड़ने” जैसे शब्द का इस्तेमाल किया तो मैं यह बता दूं कि सचमुच मैं उन्हें इतने सारे तरीकों से अपने बच्चे को बिगाड़ते हुए देख सकती हूँ।

अपने दादा दादी के आसपास अपने बच्चे के व्यवहार का अवलोकन करते हुए, मैंने उन अन्य बच्चों पर भी ध्यान दिया, जो अपने दादा-दादी के साथ-साथ अपने माता-पिता के साथ रहते थे।  स्पष्ट अंतर था।

१. अपने माता-पिता की उपेक्षा करना – सबसे बड़ा अंतर मैंने देखा कि दादा-दादी के साथ रहने वाले बच्चों के मामले में उनके माता-पिता की उपस्थिति से इनकार है।  अधिकांश बार दादा-दादी अपने पोते-पोतियों को दुलार के कारण जाने-अनजाने में उनके माता-पिता को उनकी उपस्थिति में अनदेखा कर देते हैं।  यदि ऐसा अक्सर होता है तो बच्चा अपने माता-पिता के साथ उसी तरह के व्यवहार का अनुकरण करने लगता है।

२. ज़िद करना – मेरा मानना ​​है कि जब एक व्यक्ति किसी अच्छे कारण के लिए बच्चे के साथ सख्त व्यवहार करता है तो इसे संतुलित करने के लिए बच्चे को लाड़ प्यार करने के लिए भी कोई होना चाहिए और।  लेकिन हर बार उनकी शरारतों को नज़रअंदाज़ करना लगभग उन्हें प्रोत्साहित करने जैसा है।  और यह वही है जो ज्यादातर दादा दादी करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बच्चे को जिद्दी बना दिया जाता है।

३. सही और गलत की समझ न होना – मान लीजिए कि आप जो भी करते हैं वह हमेशा सही होता है या सही घोषित कर दिया जाता है, क्या आप कभी यह जान पाएंगे कि क्या सही था और क्या गलत।  क्या आपने ध्यान दिया कि आपके माता-पिता अापके बच्चे के लिए सब कुछ सही मानते हैं?  बहुत दूर नहीं जाऊंगी, मेरी अपनी माँ को बहुत मज़ा आता है जब मेरा बच्चा मुझे मेरे नाम से पुकारता है, उनके हिसाब से उसके मुंह से मेरा नाम सुनना उन्हें  बहुत प्यारा लगता है।  लेकिन क्या यह प्यारा लगता है जब एक बड़ा व्यक्ति अपनी माँ को उसके नाम से पुकारता है ??  बिल्कुल नहीं है ना?


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४. किसी भी चीज़ के लिए प्रयास करने से मना करना – जो कुछ भी आप चाहते हैं उसकी कल्पना करते ही वह चीज आपको मिल जाए, आपको बस उसके लिए पूछना है।  क्या आप फिर भी बाहर जाकर उसके लिए कड़ी मेहनत करना पसंद करेंगे?  नहीं, कौन करना चाहेगा?  चूंकि मेरा बेटा इतना बड़ा और होशियार हो गया है कि उसे अपने लिए एक पसंदीदा बॉलीवुड गीत को चुनने की समझ आ गयी है। मैंने उसके साथ वस्तु विनिमय की कोशिश की जैसे उसे उसे मेरा फोन देने के बदले में पहले खाना खत्म करने को कहा या उसे खाने के साथ खेलने के बदले में कीचड़ में न खेलने को कहा।  आप अब तक अनुमान लगा ही चुके होंगे कि मेरी इस चतुराई का क्या हुआ होगा।  वह अब अच्छी तरह से जानता है कि उसे ऐसे मामलों में किसकी मदद लेनी चाहिए, बिल्कुल, उसके दादा-दादी।  यही कारण है कि वह किसी भी चीज़ के लिए प्रयास नहीं करना चाहता और अपने बचाव के लिए अपने दादा-दादी का इस्तेमाल करता है।

ये सभी बातें एक बच्चे के परिप्रेक्ष्य में सरल लगती हैं।  लोग कई तरह की बातें कहते हैं जैसे”अगर बच्चे शरारत नही करेंगे तो कौन करेगा”, “यह उसकी उम्र है, उसे वह करने दो जो वह चाहता है”, “वह सिर्फ एक छोटा बच्चा है वह नहीं जानता कि क्या सही है या क्या गलत है”,  और “यह सब ठीक हो जाएगा जब वह बड़ा हो जाएगा”। हाँ यह सब सच हो सकता है, लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि “बच्चे एक सादे स्लेट की तरह हैं, और जो कुछ भी आप वहां लिखते हैं वह हमेशा के लिए रह जाता है”।

 कोई भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता है कि बच्चे के आसपास एक बुजुर्ग व्यक्ति होने के नाते, माता-पिता के लिए एक बच्चे की परवरिश करना एक बड़ी मदद के रूप में आता है।  उनका अनुभव सबसे महत्वपूर्ण समय पर काम आता है।  एक बड़े परिवार के अनगिनत फायदे हैं, उनमें से कुछ जो मैंने अपने बेटे के मामले में अनुभव किया है कि वह दिन भर ज्यादातर खुश रहता है, वह कभी ऊबता नहीं है, जल्दी से चीजें सीखता है और अपने माता-पिता की क्षमताओं से परे प्यार पाता है।  मैं बच्चों के अपने दादा-दादी के साथ रहने के  बिल्कुल खिलाफ नहीं हूं, लेकिन केवल अपने बच्चे के भविष्य के बारे में चिंतित हूं। हालांकि मैं यह आशा करती हूं कि जो लोग कहते हैं कि “यह सब ठीक हो जाएगा जब वह बड़ा हो जाएगा”, आगे चलकर सच हो।

 ये कुछ सुझाव  हैं जिनकी सहायता से आप इस मुद्दे से निपट सकते हैं: –

 1. बात करें – किसी भी अन्य जटिल मुद्दे की तरह, बात करना  इस मुद्दे के लिए महत्वपूर्ण है।  अगर दादा-दादी पहली बार समझ नहीं पाते हैं, तो निराश मत हो, फिर से कोशिश करें, शोध करें, सबूत इकट्ठा करें, लेख पढ़ें।  अपनी चिंताओं को समझाने की कोशिश करें।  यहां तक ​​कि अगर आप उनमें से एक को भी मना पाते हैं, तो समझ लीजिए कि आधी लड़ाई जीत ली। वे ज़रूर बाकियों को समझाने में आपकी मदद करेंगे।

 2. अपने बच्चे से बात करें – मैंने अनुभव किया है कि छोटी उम्र में ही अपने बच्चे से बात करना कितना असरदार साबित होता है।  उनके पास आपका अविभाजित ध्यान है, वे आप पर भरोसा करते हैं और वे जो कुछ भी देखते हैं और सुनते हैं उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।  इसलिए या तो उन्हें दयालुता और कृतज्ञता की कहानियाँ पढ़कर सुनाएं या उन्हें अपने संदेश को समझने के लिए वास्तविक जीवन के उदाहरणों का उपयोग करें।

 3. अपने बच्चे को एक प्लेग्रुप में डालें – अपने बच्चे को समान उम्र के अन्य बच्चों के साथ रखना निश्चित रूप से आपकी मदद करेगा।  इसके अलावा, एक स्कूल जैसी जगह में होना उन्हें अनुशासन, समायोजन और कई अन्य आवश्यक शिष्टाचार सिखाता है।

 मैं इस बारे में आपकी राय जानने के लिए उत्सुक हूं। और यदि आपने वास्तविक जीवन में इस मुद्दे से जुड़ा हुआ कुछ महत्वपूर्ण देखा है तो जरूर सांझा करें।


About The Author – Akanksha Singh

Akanksha Singh is an IT professional turned blogger and a stay at home mother. She is currently living in Allahabad and blogs about her views on social issues and her experiences as a parent. Follow her on Instagram at https://Instagram.com/mominprocess

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